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तापी मेगा रिचार्ज परियोजना को रद्द करने की मांग, परियोजना से 50 गांव होंगे उजड़ने को मजबूर  मेलघाट अभ्यारण्य विस्तार और चिल्लौर-नहरपुर परियोजना से हजारों परिवारों पर विस्थापन का खतरा

By,वामन पोटे

जल, जंगल, जमीन नहीं देंगे,  आदिवासियों ने सरकार को दी चेतावनी

बैतूल में आदिवासी समुदाय का ऐतिहासिक प्रदर्शन, राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन
तापी मेगा रिचार्ज परियोजना को रद्द करने की मांग
तापी मेगा रिचार्ज परियोजना से 50 गांव होंगे उजड़ने को मजबूर
 मेलघाट अभ्यारण्य विस्तार और चिल्लौर-नहरपुर परियोजना से हजारों परिवारों पर विस्थापन का खतरा
बैतूल। आदिवासी समुदाय ने केंद्र सरकार के प्रस्तावित तापी मेगा रिचार्ज प्रोजेक्ट के विरोध में 25 मार्च को जिला मुख्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया। जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रदेश संयोजक जामवन्त सिंह कुमरे के नेतृत्व में करीब 5 हजार आदिवासी बैतूल कलेक्ट्रेट पहुंचे और राष्ट्रपति और राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। उनका कहना है कि इस परियोजना से मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के सैकड़ों गांव डूब क्षेत्र में आ जाएंगे, जिससे हजारों परिवारों का जीवन संकट में पड़ जाएगा।
– ज्ञापन में रखी कई मांगें
आदिवासी समुदाय ने अपने ज्ञापन में स्पष्ट किया कि बिना स्थानीय जनता की सहमति के किसी भी प्रकार की परियोजना शुरू नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने तापी मेगा रिचार्ज प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग की। साथ ही, सरकार को चेतावनी दी कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए वे आंदोलन जारी रखेंगे।
ज्ञापन में संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों का हवाला देते हुए बताया गया कि अनुसूचित क्षेत्रों में बिना ग्रामसभा की सहमति के कोई भी परियोजना लागू करना असंवैधानिक है। उनका आरोप है कि सरकार आदिवासियों की परंपराओं और संस्कृति को दरकिनार कर विकास के नाम पर जबरन उनकी जमीनें छीन रही है।
– तापी मेगा रिचार्ज प्रोजेक्ट से 50 गांवों को खतरा
तापी मेगा रिचार्ज परियोजना बैतूल और खंडवा जिले के 50 गांवों को प्रभावित करेगी। करीब 9 लाख एकड़ भूमि डूब क्षेत्र में आ सकती है, जिससे हजारों लोग विस्थापित हो जाएंगे। आदिवासियों का कहना है कि इस परियोजना से उनके जल स्रोत भी प्रभावित होंगे और आजीविका के साधनों पर संकट आ जाएगा।
मेलघाट अभ्यारण्य विस्तार भी बना चिंता का कारण
ज्ञापन में मेलघाट अभ्यारण्य के विस्तार का भी विरोध किया गया। भैंसदेही और भीमपुर विकासखंड के 25 से 30 गांवों को इस विस्तार के चलते विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है। आदिवासी समुदाय का कहना है कि वे पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए हैं और उनकी संस्कृति, परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं जंगलों से जुड़ी हुई हैं।
– चिल्लौर-नहरपुर परियोजना से भी विस्थापन का खतरा
इसके अलावा, चिल्लौर-नहरपुर परियोजना को लेकर भी आदिवासियों ने चिंता जताई। इस परियोजना से करीब 12 गांवों के लोग विस्थापन की चपेट में आ सकते हैं। ज्ञापन में बताया गया कि इन परियोजनाओं से आदिवासियों की आजीविका पूरी तरह प्रभावित होगी और उन्हें पुनर्वास के नाम पर उचित मुआवजा भी नहीं मिलेगा।
– मंडला जिले की घटना का भी किया जिक्र
ज्ञापन में मंडला जिले की एक घटना का जिक्र भी किया गया, जहां जंगल से लकड़ी लाने गए एक आदिवासी मजदूर की गोली लगने से मौत हो गई। आरोप है कि प्रशासन ने उसे नक्सली बताकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की, जबकि वह सिर्फ अपने परिवार के लिए लकड़ी इकट्ठा कर रहा था।
– संविधान की अवहेलना का आरोप
आदिवासी संगठनों ने सरकार पर संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें आदिवासी विरोधी नीतियां लागू कर रही हैं, जिससे समुदाय को असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
– यह है आदिवासियों की मांगें
तापी मेगा रिचार्ज परियोजना को तुरंत रद्द किया जाए।
मेलघाट अभ्यारण्य का विस्तार रोका जाए। चिल्लौर-नहरपुर परियोजना को बंद किया जाए। विस्थापन प्रभावितों को मुआवजा और पुनर्वास की गारंटी दी जाए। मंडला जिले की घटना की निष्पक्ष जांच कर दोषियों को सजा दी जाए।
– संघर्ष जारी रखने की दी चेतावनी
आदिवासी संगठनों ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए आदिवासी समुदाय हर संभव प्रयास करेगा।
इसमें शामिल होने वाले प्रमुखों में ग्रामीण क्षेत्र से आये पदाधिकारी रामा ककोडिया, संदीप मंडावी, राजकुमार मर्शकोले,महंगू पटेल भीमसिंह कुमरे, हरसूद धुर्वे सरपंच, अनिल उइके सरपंच, राजू धुर्वे, जिला संगठन पदाधिकारी हेमंत सरियाम, जामवन्त सिंह कुमरे, रामु टेकाम,संदीप धुर्वे, हेमंत वागद्रे, सोनू धुर्वे, सोनू पांसे रितिक परते
आदि मौजूद रहे

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